#PM मोदी को कानपुर के प्रकाशको ने भेजी पाती,डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति को वापस लेने के लिये किया आग्रह
Updated Date:24 Aug 2016 | Publish Date: 24 Aug 2016
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*पीएम मोदी को कानपुर के प्रकाशकों ने पत्र भेजकर DAVP की दमनकारी नीति को वापस लेने का किया आग्रह।*

*कानपुर-*सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी 2016  की नई DAVP विज्ञापन नीति को लेकर खासकर लघु एवं मध्यम समाचार पत्र संचालको ने कड़ा विरोध जताते हुये *देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी* को पत्र भेजकर अविलंब इस *तानाशाह नीति को वापस* लेने का आग्रह किया है, समाचार पत्र संचालकों ने *इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताते हुए प्रधानमंत्री को भेजे पत्र में लिखा...................*

*माननीय नरेन्द्र मोदी जी- आपने वर्ष 2014 में देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी सँभाली थी तो देश में हर्षोल्लास का वातावरण था। जनसाधारण से लेकर समाज का प्रबुद्ध वर्ग कहे जाने वाले पत्रकार समुदाय में भी आपके प्रति विशेष आकांक्षायें थी क्यों की आपकी ताजपोशी में मझोले एवं छोटे मझोले समाचारपत्रों का अविस्मरणीय योगदान था। लेकिन आपके अधीनस्थ सेवारत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय(डीएवीपी) की नई विज्ञापन नीति से देश के छोटे एवं मझोले समाचारपत्रों पर बन्दी की तलवार लटक गयी है और देश के लाखों पत्रकारों के परिवारों को भुखमरी का संत्रास सहन करना पड़ेगा।*
*अतः आपसे करबद्ध निवेदन है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की इस जनविरोधी (डी.ए.वी.पी) नीति वर्ष 2016 के निम्न बिंदुओ पर अविलम्ब विचार करते हुए यथेष्ट संसोधन करने की अनुकम्पा करे:-*

ज्ञात हो कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के निर्देशन में द्रश्य प्रचार निदेशालय ‘डीएवीपी’ द्वारा 15 जून को एक पत्र जारी किया गया है जिसमें एबीसी और आरएनआई का प्रमाण पत्र 25 हजार प्रसार संख्या से अधिक वाले समाचार पत्रों के लिए अनिवार्य किया गया है। इसके लिए 25 अंक रखे गए हैं। इसी तरह कर्मचारियों के पीएफ अंशदान पर 20 अंक रखे गए हैं। समाचार पत्र की पृष्ठ संख्या के आधार पर 20 अंक निर्धारित किए गए हैं। स्वयं का प्रिंटिंग प्रेस होने पर 10 अंक और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रसार संख्या के आधार पर फीस जमा करने पर 10 अंक दिए गए हैं। इस तरह 100 अंक का वर्गीकरण किया गया है और अनिवार्य 45 अंक प्राप्त करने वाले को ही विज्ञापन मान्यता मिलेंगी, जो वर्तमान में शीर्ष अखबार संचालकों को छोडकर अधिकाँश लघु एवं मध्यम समाचार पत्र संचालक पूरा ही नहीं कर सकते। परिणाम स्वरूप उनके सरकारी विज्ञापन बन्द करने का प्रावधान है। जिससे अधिकांश देश के समाचारपत्र प्रकाशन बन्द होने की स्थित में पहुँच जाएंगे *इसलिए पॉइंट सिस्टम अव्यवहारिक है।*

*अंको का निर्धारण निम्नवत है।*

(1) आरएनआई/एबीसी सर्कूलेशन सर्टीफिकेट-25 अंक।

(2) ईपीएफ-20 अंक प्रति कर्मचारी पर एक अंक के हिसाब से।

(3) प्रिटिंग मशीन-10 अंक।

(4) समाचार एजेन्सी हिन्दुस्थान/पीटीआई/यूएनआई-15 अंक।
   
(5) प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया की लेवी फीस-10 अंक।

(6) समाचार पत्र की पेज संख्या-20 अंक
8पेज -12
10पेज-14
12पेज-16
14पेज-18
16 पेज-20

*(1)प्रसार संख्या-*आरएनआई और एबीसी सार्टीफिकेट अभी तक 75000 की सर्कूलेशन से ऊपर के पेपरों को अनिवार्य था जिसे अब घटाकर 45000 कर दिया गया है। यह नियम अभी बताया जा रहा है और तुरंत ही लागू किया जा रहा है तो यह 25 अंक कैसे लिया जा सकता है। आरएनआई अभी सर्कुलेशन सार्टिफिकेट जारी ही नहीं कर रही है। और आरएनआई उन्ही पेपरों की जांच की बरियता देता है। जिनके पास स्वयं का प्रिंटिंग प्रेस हो।

*(2)ईपीएफ-* कर्मचारियों के भविष्य निधि के संबंध में अधिकांश समाचार पत्रों के पास इतने कर्मचारी नहीं हाते जो ईपीएम खाता संख्या प्राप्त कर सके। लघु या मझोला समाचार पत्र लगभग 7-8 कर्मचारियों से प्रकाशित हो जाता है। इपीएम के लिए 20 कर्मचारी अनिर्वाय होते है।

*(3)प्रिटिंग मशीन* करोडों का प्रोजक्ट है जो हर समाचार पत्र के मालिक के सामर्थ्य के बाहर की बात है। तीन चार घंटे के उपयोग के लिए यह खर्च सम्भव नहीं है। जबकि इससे कम के इनवेस्टमेंट में काम निकाला जा सकता है।

*(4) समाचार एजेन्सी* की बाध्यता भी तर्क संगत नहीं है।अगर हम संवाददाता रखे है उनको वेतन दे रहे हैं और समाचार पत्र में ज्यादातर क्षेत्रीय समाचारों का प्रकाशन करते है तो यह अनिवार्यता बाध्यकारी  है। आजकल पीआईबी, डीआईपीआर पीआर व स्थनीय निकाय समाचार पत्रों को नियमित व दैनिक निशुल्क समाचार मेल या अपनी वेबसाइट पर फोटो समेत उपलब्ध कराते हैं जो एजेन्सी से कहीं अधिक त्वरित विश्वसनीय होते हैं।

*(5)डीएवीपी की नीति के अनुसार प्रिंटिंग ऐरिया न्यूनतम 7600 सेमी होनी चाहिए।* नई नीति में 8 पेज से कम पेपरों को शून्य अंक दिया गया है। तो ऐसे पेपरों को पैनल में लिया ही क्यों जाता है। यह अनिवार्यता भी न्याय असंगत है। चार और छः पेज पेपरों को भी कुछ अंक दिया जाना चाहिए था।

*एक बात और जब सीए की सार्टिफेट मान्य की जाती है तो सीए सार्टीफिकेट को भी कुछ अंक दिया जाना चाहिए था।* आरएनआई तो भारत सरकार की संस्था है पर एबीसी प्राईवेट संस्था है इसे भी अंक से मुक्त किया जाना चाहिए।

*आवधिक पत्र-पत्रिकाओं के सम्बन्ध में-* डीएवींपी, आवधिक जैसे साप्ताहिक/पाक्षिक या मासिक पत्र-पत्रिकाओं को राष्ट्रीय या महत्वपूण अवसरों पर ही केवल 3 या 4 विज्ञापन जारी करता है। पत्र पत्रिकाओं को राष्ट्रीय विज्ञापन देने के लिए इन पर पॉइंट सिस्टम लगाना कत्तई उचित नही है।
*अतः समाचार पत्र प्रकाशकों का आपसे विनम्र निवेदन है कि नई नीति को संशोधित कर उक्त पॉइंट सिस्टम को समाप्त करने की कृपा करें ताकि लघु एवं मझोले समाचार पत्रों का निर्बाध रूप से प्रकाशन होता रहे।सभी प्रकाशक नई विज्ञापन नीति में यथोचित संशोधन करने का आपसे निवेदन करते है।*
*सधन्यवाद*
*वास्ते डी०ए०वी०पी विरोधी मंच यूपी*
*अभय त्रिपाठी (संयोंजक)*

 गौरतलब है कि 15 जून को जारी की गई वर्ष 2016 की इस नई नीति से पत्र संचालकों में खासा आक्रोश है. लघु एवं मध्यम समाचार पत्र पत्रिकाओं व समाचार एजेंसियों के संचालको ने इसे *सरकार का षडय़ंत्र करार दिया है तथा इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठारा घात बताया है. इस नयी नीति से आक्रोशित लघु एवं मध्यम समाचार पत्र संचालकों ने इसके खिलाफ सारे देश में व्यापक आन्दोलन छेड़ दिया  है।साथ ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस तानाशाह विज्ञापन नीति के विरोध  में सभी पत्रकारों को एकजुट करने के लिए *DAVP नीति विरोध् मंच UP* का गठन किया गया जो *उत्तर प्रदेश के सभी पत्रकार संगठनों और प्रकाशकों का साझा मंच है जिसके नेतृत्व में davp नीति के विरुद्ध आन्दोलन चलाया जा* रहा है।

*वही प्रधानमंत्री को पत्र भेजने वालो* में प्रमुखरूप से मयंक शुक्ला संपादक टीम वर्क,अभिषेक त्रिपाठी सम्पादक शहर दायरा,भावना सम्राट के संपादक अवधेश मिश्रा,अभिकथन के संपादक नीरज तिवारी,अलोक संपादक वतन में अमन,ब्रम्ह किशोर अवस्थी संपादक ब्रम्ह इन्वेस्टिगेशन न्यूज़,राघवेन्द्र चौहान संपादक नगर संवाद,संकल्प सिंह सचान सम्पादक पब्लिक रुट, के सी दीक्षित संपादक बिठूर टाइम्स,अनुज त्रिपाठी उप संपादक परिक्रमा विचारधारा,गौरव त्रिपाठी संपादक लोक छाया, के के अरोड़ा संपादक पैराडाइस,अक्षन्स चतुर्वेदी प्रबंध संपादक सैनिक सौर्य,अनिल अवस्थी,विकास अवस्थी शहर दायरा,चन्द्रशेखर संपादक अपना अभियान,राजीव मिश्रा, आनंद कुमार मिश्रा,अशोक गोयल, समेत सैकड़ो अख़बारों के संचालक रहे।
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